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अब्राहम लिंकन और मार्टिन लूथर किंग के विचारों को मानने वाले, दक्षिण अफ्रिका के गाँधी नेल्सन मंडेला का जन्म बासा नदी के किनारे ट्रांस्की के मवेंजो गाँव में 18 जुलाई, 1918 को हुआ था। माता का नाम नोमजामो विनी मेडीकिजाला था, वे एक मैथडिस्ट थीं। पिता का नाम गेडला हेनरी था। वे गाँव के प्रधान थे। उन्होने बालक का नाम रोहिल्हाला रखा, जिसका अर्थ होता है पेङ की डालियां तोङने वाला या प्यारा शैतान बच्चा। बारह वर्ष की अल्प आयु में उनके सर से पिता का साया उठ गया था। नेल्सन मंडेला की प्रारंभिक शिक्षा क्लार्कबेरी मिशनरी स्कूल में एवं स्नातक शिक्षा हेल्डटाउन में हुई थी। ‘हेल्डटाउन’ अश्वेतों के लिए बनाया गया विशेष कॉलेज था। इसी कॉलेज में मंडेला की मुलाकात ‘ऑलिवर टाम्बो’ से हुई, जो जीवन भर उनके दोस्त एवं सहयोगी रहे। 1940 तक नेल्सन मंडेला और ऑलिवर ने कॉलेज कैंपस में अपने राजनैतिक विचारों और क्रियाकलापों से लोकप्रियता अर्जित कर ली थी। कॉलेज प्रशासन को जब इसकी खबर लगी तो दोनो को कॉलेज से निकाल दिया गया।

नेल्सन ने 1952 में कानूनी लङाई लङने के लिए एक कानूनी फर्म की स्थापना की। नेल्सन की बढती लोकप्रियता के कारण उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। आन्दोलन और नेल्सन जीवन संगी बन गये थे। एएनसी (ANC) ने स्वतंत्रता का चार्टर स्वीकार किया और इस कदम ने सरकार का संयम तोङ दिया। 1989 को दक्षिण अफ्रिका में सत्ता परिर्वतन हुआ और उदारवादी नेता एफ डब्ल्यू क्लार्क देश के मुखिया बने। उन्होने अश्वेत दलों पर लगा सभी प्रतिबंध हटा दिया। उन सभी बंदियों को रिहा कर दिया गया जिन पर अपराधिक मुकदमा नही चल रहा था। मंडेला की जिंदगी की शाम में आजादी का सूर्य उदय हुआ। 11 फरवरी 1990 को मंडेला पूरी तरह से आजाद हो गये। 1994 देश के पहले लोकतांत्रिक चुनाव में जीत कर दक्षिण अफ्रिका के राष्ट्रपति बने।

आमतौर पर छींटदार शर्ट पहनने वाले नेल्सन मंडेला मजाकिया मिजाज के बेहद हँसमुख व्यक्ति थे। 1993 में ‘नेल्सन मंडेला’ और ‘डी क्लार्क’ दोनो को संयुक्त रूप से शांती के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया। 1990 में भारत ने उन्हे देश के सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया। मंडेला, भारत रत्न पाने वाले पहले विदेशी हैं। दक्षिण अफ्रिका में रंगभेद विरोधी आंदोलन के पुरोधा, महात्मा गाँधी से प्रेरणा लेने वाले देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का लम्बी बीमारी के बाद 5 दिसंबर 2013 को निधन हो गया। आज भले ही मंडेला इस नश्वर संसार में नही हैं, लेकिन उनके त्याग और संघर्ष की महागाथा पूरी दुनिया को प्रेरणा देने के लिए जीवित है।

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