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हम आज भी शतरंज़ का खेल
अकेले ही खेलते हे ,
क्युकी दोस्तों के खिलाफ चाल
चलना हमे आता नही ..।

मेरे लफ्जों से न कर मेरे किरदार का फेसला ,
तेरा वजूद मिट जाएगा मेरी हकिगत ढूंढते ढूंढते !

तू मोहब्बत है मेरी इसीलिए दूर है मुझसे…
अगर जिन्दा होती तो शाम तक बाहों में होती ।

जी भर गया है तो बता दो
हमें इनकार पसंद है इंतजार नहीं…!

मुझको पढ़ पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं,
मै वो किताब हूँ जिसमे शब्दों की जगह जज्बात लिखे है….!!

मेरी फितरत में नहीं अपना गम बयां करना ,
अगर तेरे वजूद का हिस्सा हूँ तो महसूस कर तकलीफ मेरी..।।

जनाब मत पूछिए हद हमारी गुस्ताखियों की ,
हम आईना ज़मीं पर रखकर आसमां कुचल दिया करते है ।

इतना भी गुमान न कर आपनी जीत पर ” ऐ बेखबर ”
शहर में तेरे जीत से ज्यादा चर्चे तो मेरी हार के हैं।….।। 

मुझमे खामीया बहुत सी होगी मगर,एक खूबी भी है,
मे कीसी से रीश्ता मतलब के लीये नही रखता ।

खून अभी वो ही है ना ही शोक बदले ना ही जूनून, सून लो फिर से,
रियासते गयी है रूतबा नही, रौब ओर खोफ आज भी वही हें |

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