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“हमारी आस्था अन्धविश्वास पर आधारित नहीं होनी चाहिये। आस्था और विश्वास ऐसी होनी चाहिये जो सकारात्मक उर्जा उत्पन्न करे, ताकि व्यक्ति के साथ-साथ समाज को भी लाभ हो। आस्था व्यक्ति को सहज बनाती है, न कि आत्ममुग्ध।”
- अज्ञात

एक बार भगवान बुद्ध भिक्षा हेतु नगर में भ्रमण कर रहे थे। भिक्षा लेने के उपरांत उन्होंने देखा कि एक गृहपति संध्या वंदन के उपरांत हाथ जोड़कर छहों दिशाओं को प्रणाम कर रहा है। भगवान बुद्ध स्वाभाविक ही उसकी ओर मुड़े और उससे पूछा, "मान्यवर, आपने अभी-अभी छहों दिशाओं को अलग-अलग प्रणाम किया है। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि आपने ऐसा क्यों किया?

"इसका कारण तो मै भी नहीं जानता हूँ भगवान! मेरे पूर्वज अपने जीवनकाल में ऐसा करते रहे हैं, इसलिये मै भी ऐसा कर रहा हूँ।" - उस व्यक्ति ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

जब आप ऐसा करने के पीछे कोई कारण नहीं जानते हैं तो फिर ऐसी उपासना का औचित्य ही क्या रह जाता है? अज्ञानपूर्वक किये गये कर्म में कोई श्रद्धा नहीं रहती और जिस कर्म को श्रद्धा से रहित होकर किया जाता है वह निष्फल हो जाता है। - भगवान बुद्ध बोले।

"भंते फिर आप ही यह बता दीजिये कि हम छहों दिशाओं को किसलिए प्रणाम करते हैं?" - उस व्यक्ति ने कहा।

भगवान बुद्ध बोले - "माता-पिता और गृहपति पूर्व दिशा हैं। उन्हें हमें यह सुरदुर्लभ जीवन देने और उनके अनन्य त्याग के लिये नमन किया जाता है। आचार्यगण दक्षिण दिशा हैं। उन्हें इस जीवन को सार्थक दिशा देने और अमूल्य विद्यादान के लिये प्रणाम किया जाता है। स्त्री तथा पुत्र-पुत्रियाँ पश्चिम दिशा हैं। उन्हें उनके स्नेह और जीवन को रसपूर्ण बनाने के लिये नमन किया जाता है। बंधु और मित्र उत्तर दिशा हैं। वे सुख में साथ-साथ हर्षित होते हैं और दुख में पीड़ा बांटते हैं। उन्हें उनके सहयोग और सुरक्षा प्रदान करने के लिये नमन किया जाता है।

श्रमण-ब्राह्मण उर्ध्व दिशा हैं। वे समस्त मानव समाज को तप-त्याग और सेवा-परमार्थ की शिक्षा अपने जीवन द्वारा देते हैं। श्रेष्ठता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने हेतु उन्हें प्रणाम किया जाता है। और सेवक अधोदिशा हैं। इस तरह इन छहों दिशाओं को किया गया प्रणाम इन सभी लोगों को किये गये प्रणाम करने के सामान होता है। "यह तो सही है भंते! परन्तु सेवकों को प्रणाम करने का क्या कारण है? हम सेवकों से उच्च हैं, इसलिये वे हमें प्रणाम करते हैं। फिर यह विरोधाभास किसलिए?

भगवान बुद्ध ने कहा, "श्रेष्ठता का अभिमान अपने ह्रदय से निकाल दो मित्र! सेवक भी हमारी तरह मनुष्य ही हैं और यदि वे हमारी सेवा करने को सदैव तत्पर रहते हैं, तो तब हमारा भी उनके प्रति यह कर्त्तव्य बनता है कि उन्हें भी वही स्नेह और सम्मान दें, जो उन्होंने हमें दिया है। सेवकों को कभी तुच्छ मत समझना। अपनी शंकाओं का समुचित समाधान पाकर वह व्यक्ति प्रसन्न हो गया और उसने भगवान बुद्ध के चरणों में प्रणाम कर सभी के प्रति कृतज्ञ रहने का निश्चय किया।

“चन्द्रमा अपना प्रकाश पूरे संसार में फैलाता है, लेकिन कलंक अपने पास ही रखता है। सत्पुरुष भी अपने गुणों से पूरे जगत को आलोकित करते हैं और कमियों को दूसरों तक नहीं जाने देते।”
- रामकृष्ण परमहंस

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