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ये प्यार भी कितना अजीब होता है ना...,
चाहे वो कितनी भी तकलीफ दे फिर भी सुकून सिर्फ उसी के पास मिलता है....

मुहब्बत इक रोग़ है मुहब्बत अब नहीं होगी,
मुहब्बत इक तमाशा है शिक़ायत अब नहीं होगी..

आदमी परख़ने की एक ये भी निशानी है,
गुफ्तगू बता देती है कौन ख़ानदानी है... 

हार जाउँगा मुकदमा उस अदालत में, ये मुझे यकीन था.. 
जहाँ वक्त बन बैठा जज और नसीब मेरा वकील था…!

अपनों से अच्छा तो ग़म है,
कभी साथ ही नहीं छोड़ता...  

उन आँखों की दो बूँदों पर सातों सागर हारे हैं ,
जब मेंहदीं वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारें हैं..! 

तुम लाख़ कोशिशें करलो 'आकाश', अब कभी ना हो पायेगी सुलह,
गर फ़िर भी मिलना चाहो, तो मिलते रहना एक अजनबी की तरह... 

ये अनाम सा रिश्ता है,जो है....तेरे मेरे दरमियाँ,
मुझे ! बेवजह फिर से ,जीने की ,वज़ह देता है...
 

यह कौन शरमा रहा है यूँ फ़ुर्सत में याद कर के,
कि हिचकियाँ आना तो चाहती हैं पर हिच-किचा रही हैं... 

मुलाकातें नहीं मुमकिन ...मुझे अहसास है.. लेकिन ,
तुम्हें मैं याद करती हूँ .. बस इतना याद ऱखना तुम .... !!

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