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बाल मनौविज्ञान पर यह लेख हर माता पिता के लिए पढ़ना अनिवार्य है।

 
दक्षिण भारत में लगभग ५००० वर्ष पहले के विख्यात विचारक "तिरूवलुवर" द्वारा लिखित "बाल मनोविज्ञान" की बहुचर्चित पुस्तक "तिरूक्कुरल" आज भी प्रासंगिक है। इस पुस्तक में लिखे कुछ सुत्रों पर हमें मंथन करना चाहिए। 

  • अगर हम बच्चों की सफलता पर पीठ ठोकते रहे हैं पर उसकी असफलता पर उसें प्रोत्साहित नहीं करते तो वे इर्शालु बन जाएँगें। 
  •  अगर हम बच्चों को प्यार की झप्पी देने में कंजूसी कर रहे हैं और उन्हे उपेक्षित करते है तो वे भी हमें अकारण परेशान करना शुरू कर देगें। 
  • अगर हम बच्चों की छोटी सी ग़लती पर भी नाराज़गी दिखाते हैं तो वो निश्चित ही हमसें झुठ बोलना शुरू कर देगें। 
  • अगर हमें बच्चों को बात बात में टोकते हैं को वे हमारी संगति से बचना शुरू कर देगें। 
  • अगर हम अपने बच्चे की बढ़ाई कम कर रहे हैं पर डाँटते ज्यादा है तो उनके स्वाभिमान में सदा के लिए कमी आ जाएँगी। 
  • अगर हम अपने बच्चों को अक़ेले में समझाने की बजाए सबके सामने ही कोसते है तो वो बुज़दिल बन जाएँगें। 
  • अगर हम अपने बच्चे के लिए ख़रीदारी करते हुए उसकी पसन्द का ध्यान नही रखते तो वह दूसरे की वस्तुओं को चोरी करना शुरू कर देगें। 
  • अगर हम  बच्चों की ज़रूरत से ज्यादा मदद कर रहे हैं और उनकी मदद करने में जल्दबाज़ी करते हैं और वह डरपोक बन जाएँगे।   
  • अगर हम बच्चों को आदेश ज्यादा दे रहे हैं पर उनसे हमारा संवाद कम करते है तो वे हमारी भावनाओं की क़दर करना छोड़ देगें। 
  • अगर हम बच्चों के अच्छे बर्ताव को नज़रअंदाज़ कर रहे पर उसकी बदतमीज़ी पर ज्यादा ध्यान देते है तो वे ग़ुस्सैल बन जाएँगें। 
  • अगर हम बच्चों के साथ कम से कम एक बार का भोजन नही कर रहें और उनके समक्ष बचपना दिखाते हैं तो हम सदा के उनकी श्रद्धा खो देगें। 
  •   अगर हम बच्चों को किसी ग़लती पर दी सजा को लागू नहीं रहें और अपना डर बना कर नहीं रखते तो वे भविष्य में हमारी कोई बात नही मानेगें।  
  • अगर हम माता पिता बच्चों के सामने ही एक दुसरे से नित दिन झगड़ रहे हैं और उच्चे स्वर में बात करते हैं और तो वे भी हमें उलटा जवाब देना शुरू कर देगें।  
  • अगर हम बच्चों की छोटी छोटी बातों का बतंगड बना देते हैं तो वे हमसें गोपनीय हो जाँएगें। 
  • अगर हम बच्चों की बात पूरी सुने बिना ही अपना निर्णय दे देते हैं तो वो हमारी बात की बजाए दुसरे कि बात ज्यादा मानेंगे। 
  • अगर हम बच्चों के उसके संदर्भ में फ़सले लेते समय उसकी भावनाओं से ज्यादा  लोकलिहाजी का ध्यान रखते हैं तो उसका बर्ताव विद्रोही हो जाएँगा।

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