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आयुर्वेद में पेट की गड़बडिय़ों को उदर रोगों के अंतर्गत वर्णित किया गया है और अधिकांश रोगों में इसे भी एक महत्वपूर्ण कारण माना गया है। आपको आज हम कुछ ऐसी ही गड़बडिय़ों को दूर करने का आयुर्वेदिक उपाय बताते हैं।आयुर्वेद में पेट की गड़बडिय़ों में ग्रहणी,अतिसार,अरुचि,प्रवाहिका आदि रोग आते हैं,इनमें अधिकांश उदर रोगों का कारण मन्दाग्नि होता है, कुछ सरल आयुर्वेदिक नुस्खे आपको इन गड़बडिय़ों से बचा सकते हैं।

- नियमित रूप से 1-2 चम्मच सोंफ  का प्रयोग अग्नि को दीप्त करता है।

-1-1.5 ग्राम त्रिकटु (सौंठ,मरीच एवं पिप्पली ) चूर्ण  का प्रयोग भी अरुचि एवं अग्निमांद को दूर करता है।

-भोजन भूख से थोड़ा कम एवं मितभुक हो कर ही करना चाहिए।

-कुटज चूर्ण, विडंग चूर्ण एवं अविपत्तिकर चूर्ण को सममात्रा में मिलाकर 1-1.5 ग्राम की मात्रा में लेना पेट की गड़बड़ी को दूर करता है।

-हिन्ग्वासटक चूर्ण एवं लवणभास्कर चूर्ण का प्रयोग 1.5 से तीन ग्राम की मात्रा में करना पेट में अफारा या गैस बनाने के समस्या को दूर करता है।

-पंचसकार चूर्ण की 2.5 से 5 ग्राम की एक-एक मात्रा मल को साफकर पेट को हल्का रखता है।

-केवल त्रिफला चूर्ण की  नियमित 2.5-से 5 ग्राम की मात्रा उदर विकारों में रामबाण औषधि है।

-एक हरड ,दो बहेड़ा  एवं चार आंवलें का प्रयोग सभी प्रकार की  पेट से सम्बन्धित विकृतियों  को दूर करता है।

-भोजन में नमक की मात्रा 24 घंटे में 2.5ग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए ,साथ ही अत्यधिक चटपटे पदार्थों के सेवन भी बचना चाहिए।

-भोजन ग्रहण करने के तत्काल बाद शयन की प्रवृति से बचना चाहिए।

-भोजन के साथ जल पीने के प्रवृति से भी बचना चाहिए।

-भोजन बहुत जल्दी -जल्दी बिना चबाकर नहीं लेना चाहिए।

- पूरे दिन में पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ जल का  पान करना चाहिए।

-पथ्य (खाए जाने योग्य ) एवं अपथ्य ( न खाए जाने योग्य ) भोजन का ध्यान रखकर किया गया भोजन उदर रोगों को दूर रखता है।

ये हैं कुछ सामान्य पर उपयोगी बातें जिनका दैनिक जीवन में प्रयोग स्वस्थ एवं आराम से युक्त रोगमुक्त जीवन प्रदान करता है।

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