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एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा, 'बीरबल, तुम दिन में अपनी पत्नी का हाथ एक या दो बार तो अवश्य ही पकड़ते होंगे। क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारी पत्नी की कलाई में कितनी चूडिय़ां हैं?'
यह सुनकर बीरबल असमंजस में पड़ गए। उन्होंने पहले कभी पत्नी के हाथ की चूडिय़ों की गिनती नहीं की थी। कुछ देर तक विचार करने के बाद बीरबल बोले, 'जहांपनाह! मेरे हाथ का तो पत्नी के हाथों से दिन में एक-आध बार स्पर्श होता है, लेकिन आपका हाथ तो आपकी मूंछ पर दिन में दस या पांच बार तो अवश्य लगता है। भला आप ही बताएं आपकी मूंछ में कितने बाल हैं?'
बादशाह ने बात काटने की गरज से कहा, मूंछ के बाल की गणना कठिन है किन्तु हाथ की चूडिय़ों को गिनना संभव है।
जहांपनाह! स्त्रियां अपनी पसंद के अनुसार कम अथवा ज्यादा चूडिय़ां पहनती हैं। अत: निश्चित तादाद गणना किए बिना बतलाना असम्भव है।
बीरबल मुस्कराए और आगे बोले, अच्छा, आप जनानखाने में तो रोज जाते हैं। ऊपर पहुंचने के लिए आपको सीढिय़ां चढऩी पडती होंगी। क्या आप बता सकते हैं कि उस जीने में कितनी सीढिय़ां हैं?
यह सुनकर बादशाह बोले, कभी उनकी गिनती करने का अवसर ही नहीं मिला। तब बीरबल बोले, जहांपनाह! सीढिय़ां अटल हैं। बढ़ाई या घटाई नहीं जा सकतीं। इस पर भी आप निश्चित संख्या नहीं बता पाए तो चूडिय़ों की तादाद ठीक-ठीक कैसे बताई जा सकती है? यदि सीढिय़ां गिनी जा सकती तो चूडिय़ां न गिनने के दोषी हम थे, किन्तु जब चूडिय़ों का गिना जाना संभव नहीं था तो वे कैसे गिनी जाती? उनकी संख्या कैसे बताई जा सकती है?
यह बात सुनकर बादशाह बड़े प्रसन्न हुए।

साभार: साहित्यदर्शन.कॉम

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